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विरासत साधना में विद्यार्थियों ने बिखेरी शास्त्रीय नृत्य की छटा

देहरादून। रिच संस्था की ओर से नींबूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित विरासत महोत्सव-2026 के अंतर्गत मंगलवार को विरासत साधना में विद्यार्थियों ने अपनी नृत्य प्रतिभा और आत्मविश्वास से दर्शकों को प्रभावित किया। सुसज्जित मंच पर कथक और भरतनाट्यम की प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्य की सुंदरता, भावाभिव्यक्ति और सांस्कृतिक समृद्धि देखने को मिली।

कार्यक्रम में द टोंस ब्रिज स्कूल, होली चाइल्ड स्कूल, गुरु स्मृति संगीत शिक्षा केंद्र, डीडीएन, पीवाईडीएस लर्निंग अकादमी, सेंट पैट्रिक अकादमी, ऐन मेरी स्कूल, दून विश्वविद्यालय, समर वैली स्कूल, आईएमएस यूनिसन विश्वविद्यालय, झंकार नृत्य केंद्र, माउंट लिटेरा ज़ी स्कूल, सुरेंद्र संगीत विद्यालय समिति, हेरिटेज नॉर्थ कैंपस, नृत्य किंकिनी स्कूल ऑफ भरतनाट्यम, आईटी चिल्ड्रन्स अकादमी, एडु विला इंस्टीट्यूट, दून प्रेसीडेंसी स्कूल, द ओबेरॉय स्कूल ऑफ इंटीग्रेटेड स्टडीज, दून ब्लॉसम्स स्कूल और दून इंटरनेशनल स्कूल सिटी कैंपस सहित विभिन्न शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने प्रस्तुतियां दीं।

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण लतिका फाउंडेशन से जुड़े बच्चों की गढ़वाली लोकनृत्य प्रस्तुति रही। दिव्यांग बच्चों के साथ कार्य करने वाली संस्था के सात प्रतिभागियों ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं को नृत्य के माध्यम से जीवंत किया। प्रस्तुति में आदित्य पुंडीर, आशीष चार्ल्स, स्वयं सिंह, श्रुति पांडे, आस्था शर्मा, कश्वी, मयंक तथा कला ने भाग लिया।

बच्चों की सामूहिक प्रस्तुति ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने के साथ ही सांस्कृतिक गतिविधियों में समावेशिता और समान अवसरों के महत्व को भी रेखांकित किया। कथक, भरतनाट्यम और गढ़वाली लोकनृत्य के संगम ने कार्यक्रम को विविधतापूर्ण बनाया।

विरासत साधना के मंच ने विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर दिया। आयोजन में विभिन्न संस्थानों की सहभागिता और दिव्यांग बच्चों की प्रस्तुति ने कला के माध्यम से आत्मविश्वास, रचनात्मकता और सामाजिक समावेश का संदेश दिया।

 

 

‘सोल सूत्र’ में दिखी श्रीलंका की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत

देहरादून, 27 अक्टूबर। विरासत महोत्सव-2026 की सांस्कृतिक संध्या में श्रीलंका के ‘अलाप कोलंबो फोक डांस एन्सेम्बल’ ने ‘सोल सूत्र’ के माध्यम से अपनी समृद्ध लोकनृत्य परंपराओं की आकर्षक झलक प्रस्तुत की। कलाकारों की ऊर्जावान भाव-भंगिमाओं और पारंपरिक नृत्य शैलियों ने दर्शकों को श्रीलंका की सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराया।

डॉ. अंजलि मिश्रा के नेतृत्व में आई सात सदस्यीय टीम में चतुर, धेमी, तरुका, विश्मी, कसुनी, कुशानी और उपमनी शामिल रहे। दल ने श्रीलंका की पारंपरिक नृत्य शैलियों के माध्यम से वहां की लोक संस्कृति और सांस्कृतिक पहचान को मंच पर साकार किया।

प्रस्तुति की शुरुआत कांडियन नृत्य से हुई, जिसे ‘वेस’ शैली के नाम से भी जाना जाता है। अपनी विशिष्ट वेशभूषा, ऊर्जावान गतिविधियों और प्रभावशाली भाव-भंगिमाओं के लिए पहचानी जाने वाली इस नृत्य शैली ने दर्शकों का ध्यान खींचा।

कार्यक्रम का समापन लो कंट्री लोकनृत्य शैली की प्रस्तुति से हुआ। कलाकारों ने पारंपरिक लय और आकर्षक नृत्य संयोजन के माध्यम से प्रस्तुति को जीवंत बनाया।

‘सोल सूत्र’ ने विरासत महोत्सव के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक स्वरूप को मजबूती दी। इस प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों को श्रीलंका की लोक परंपराओं, कला और सांस्कृतिक विविधता को करीब से जानने का अवसर मिला।

 

रागों की मधुर प्रस्तुति में डूबे श्रोता, प्रशांत मिश्रा और अभिषेक मिश्रा ने दी संगत

देहरादून, 27 अक्टूबर। विरासत महोत्सव-2026 की सांस्कृतिक संध्या में प्रख्यात वायलिन वादक डॉ. एन. राजम की प्रस्तुति ने शास्त्रीय संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके वायलिन से निकले सुरों और रागों की मधुरता ने हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में संगीतपूर्ण वातावरण बना दिया।

कार्यक्रम में डॉ. राजम ने राग आधारित प्रस्तुति से शुरुआत की। इसके बाद उपशास्त्रीय रचनाओं की प्रस्तुति ने संगीत संध्या को विविधता प्रदान की। उनके वादन में रागों की बारीकियों और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय देखने को मिला। वायलिन पर प्रशांत मिश्रा और तबले पर पंडित अभिषेक मिश्रा ने प्रभावशाली संगत की।

डॉ. एन. राजम हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठित वायलिन वादक हैं। उन्होंने वायलिन पर गायकी अंग को विकसित करते हुए इस वाद्य को भारतीय शास्त्रीय संगीत की अभिव्यक्ति का विशिष्ट माध्यम बनाया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने संगीत के क्षेत्र में लंबे समय तक योगदान दिया और प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष तथा प्रदर्शन कला संकाय की डीन के रूप में सेवाएं दीं।

उनकी संगीत साधना और कला में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण तथा संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं। उन्होंने देश-विदेश में प्रस्तुतियां देकर भारतीय शास्त्रीय संगीत को व्यापक पहचान दिलाई है।

विरासत की सांस्कृतिक संध्या में उनकी प्रस्तुति ने एक बार फिर भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराई और वाद्य संगीत की भावनात्मक शक्ति को रेखांकित किया। सुरों की इस महफिल में श्रोताओं को शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा का सजीव अनुभव मिला।

 

‘चांदनी महफिल’ में संगीत, कथक और इतिहास का संगम, भारतीय सांगीतिक विरासत में महिलाओं के योगदान को किया याद

देहरादून, 27 अक्टूबर। विरासत महोत्सव-2026 में ‘चांदनी महफिल’ के अंतर्गत प्रख्यात कथक नृत्यांगना मंजरी चतुर्वेदी की प्रस्तुति ‘द तवायफ स्टोरी’ ने भारतीय संगीत और नृत्य परंपरा में योगदान देने वाली उन महिला कलाकारों की कहानियों को सामने रखा, जिन्हें इतिहास में अपेक्षित पहचान नहीं मिल सकी।

प्रस्तुति में संगीत, नृत्य और कथावाचन के माध्यम से उन कलाकारों की सांस्कृतिक विरासत को याद किया गया, जिनकी गायकी और बंदिशें लोकप्रिय हुईं, लेकिन जिनके नाम और योगदान समय के साथ मुख्यधारा के इतिहास से ओझल होते चले गए। मंजरी चतुर्वेदी ने मुख्तार बेगम, जद्दनबाई और नवाब जान जैसी कलाकारों का उल्लेख करते हुए भारतीय संगीत परंपरा में उनके योगदान को रेखांकित किया।

कार्यक्रम में ‘आज जाने की ज़िद न करो’ जैसी लोकप्रिय रचना के सांस्कृतिक महत्व पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। प्रस्तुति ने यह सवाल उठाया कि अनेक रचनाएं जनमानस में लोकप्रिय होने के बावजूद उनसे जुड़ी मूल सांगीतिक परंपराओं और कलाकारों की पहचान से किस तरह अलग हो जाती हैं।

‘द तवायफ स्टोरी’ के माध्यम से उन महिलाओं के कला-संसार और जीवन से जुड़े पहलुओं को अभिव्यक्ति मिली, जिनकी भूमिका भारतीय संगीत और सांस्कृतिक परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण रही है। प्रस्तुति ने दर्शकों को इतिहास के उन पक्षों पर विचार करने का अवसर दिया, जिन्हें अक्सर पर्याप्त स्थान नहीं मिलता।

लखनऊ घराने से जुड़ी मंजरी चतुर्वेदी कथक को ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों के साथ प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने कथक का प्रशिक्षण अर्जुन मिश्रा के मार्गदर्शन में प्राप्त किया और अभिनय की बारीकियों का अध्ययन भी किया। भारतीय संगीत, सूफी परंपरा और सांस्कृतिक इतिहास के विभिन्न पक्षों को अपनी प्रस्तुतियों में स्थान देना उनकी कला की विशेषता रही है।

‘चांदनी महफिल’ संगीत, कविता, नृत्य और कथावाचन को एक अंतरंग वातावरण में जोड़ने वाली प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य उन मौखिक परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को सामने लाना है, जिन्होंने पीढ़ियों से भारतीय कला को समृद्ध किया है।

विरासत महोत्सव में इस प्रस्तुति ने कला के साथ इतिहास, स्मृति और महिला कलाकारों के योगदान पर संवाद की गुंजाइश पैदा की। ‘द तवायफ स्टोरी’ ने दर्शकों का ध्यान उन अनसुनी कहानियों की ओर खींचा, जो भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं।

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