उत्तराखंड की राज्यसभा सीट के लिए भाजपा प्रत्याशी दिनेश आर्य ने किया नामांकन दाखिल, कांग्रेस ने प्रत्याशी नहीं उतारा, निर्विरोध निर्वाचन तय

देहरादून। उत्तराखंड की रिक्त होने जा रही राज्यसभा सीट को लेकर सियासी तस्वीर मंगलवार को लगभग साफ हो गई। भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी दिनेश आर्य ने विधानसभा परिसर में अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। नामांकन के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट, पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, मंत्रिमंडल के सदस्यों समेत बड़ी संख्या में भाजपा विधायक मौजूद रहे। राज्यसभा सीट के लिए नामांकन दाखिल करने का मंगलवार को अंतिम दिन था। कांग्रेस की ओर से प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे जाने के कारण दिनेश आर्य का निर्विरोध निर्वाचन लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, औपचारिक रूप से निर्वाचन की घोषणा चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी। राज्यसभा की इस सीट के लिए 16 अक्टूबर को चुनाव निर्धारित है।
साधारण कार्यकर्ता से उच्च सदन तक का सफर
दिनेश आर्य को प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं को महत्व देने के साथ-साथ कुमाऊं क्षेत्र को भी प्रतिनिधित्व देने का संदेश दिया है। आर्य लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे हैं। उन्होंने वर्ष 1985 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा से जुड़े। वर्ष 2007 से 2010 तक वह नैनीताल के जिलाध्यक्ष रहे। इसके बाद उन्हें भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा में राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली।
आर्य मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जनसंपर्क अधिकारी के रूप में भी काम कर चुके हैं। वर्तमान में उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त है और वह राज्यस्तरीय पेयजल अनुश्रवण परिषद के उपाध्यक्ष हैं। हल्द्वानी से जुड़े आर्य पिछले कुछ समय से नैनीताल विधानसभा सीट से भी दावेदारी करते रहे हैं।
कुमाऊं को उच्च सदन में प्रतिनिधित्व का संदेश
भाजपा के इस फैसले को केवल राज्यसभा का टिकट देने तक सीमित नहीं माना जा रहा है। उत्तराखंड में राज्यसभा की तीन सीटें हैं और मौजूदा समय में तीनों पर गढ़वाल क्षेत्र से जुड़े नेताओं का प्रतिनिधित्व रहा है। ऐसे में कुमाऊं क्षेत्र से आने वाले दिनेश आर्य को राज्यसभा प्रत्याशी बनाए जाने को क्षेत्रीय संतुलन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने आर्य की उम्मीदवारी को संगठन के समर्पित कार्यकर्ता के सम्मान से जोड़ते हुए कहा है कि उन्होंने लंबे समय तक पार्टी के लिए काम किया है और विशेष रूप से कुमाऊं क्षेत्र में संगठन को मजबूत करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
दलित चेहरे के जरिए बड़ा राजनीतिक संदेश
दिनेश आर्य की उम्मीदवारी का एक महत्वपूर्ण पहलू उनका अनुसूचित जाति समुदाय से आना भी है। ऐसे समय में जब प्रदेश की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज है, भाजपा ने एक जमीनी दलित नेता को उच्च सदन के लिए आगे बढ़ाकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह फैसला आगामी विधानसभा चुनाव के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। हाल के महीनों में हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कथित ‘शुद्धीकरण’ को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हुए थे। ऐसे माहौल में दलित चेहरे को राज्यसभा का टिकट देना भाजपा की सामाजिक पहुंच और राजनीतिक रणनीति, दोनों से जोड़कर देखा जा रहा है।
भाजपा के संख्याबल ने आसान की राह
70 सदस्यीय उत्तराखंड विधानसभा में भाजपा के पास 47 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के 20 विधायक हैं। एक सीट बहुजन समाज पार्टी और दो सीटें निर्दलीयों के पास हैं। विधानसभा में भाजपा के मजबूत संख्याबल के कारण राज्यसभा सीट पर पार्टी की जीत पहले से ही मजबूत मानी जा रही थी। कांग्रेस के प्रत्याशी नहीं उतारने के बाद आर्य के सामने चुनावी चुनौती लगभग समाप्त हो गई है।
मौजूदा राज्यसभा सांसद नरेश बंसल का छह वर्ष का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। इसी रिक्त होने वाली सीट के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है। अब नामांकन के बाद अगले चरण में नामांकन पत्रों की जांच और नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होगी। इसके बाद निर्विरोध निर्वाचन की औपचारिक घोषणा का रास्ता साफ होगा।
धामी ने बताया सामान्य कार्यकर्ता का सम्मान
नामांकन के अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि भाजपा ने एक सामान्य कार्यकर्ता को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है। उन्होंने कहा कि पार्टी समाज के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करती है। मुख्यमंत्री ने इस मौके पर कांग्रेस पर जातीय राजनीति करने का आरोप भी लगाया।
कुल मिलाकर, दिनेश आर्य का राज्यसभा तक पहुंचना उत्तराखंड भाजपा के लिए केवल एक सीट जीतने का मामला नहीं है। इसमें कुमाऊं को प्रतिनिधित्व, अनुसूचित जाति वर्ग को राजनीतिक संदेश, संगठन के पुराने कार्यकर्ता को सम्मान और आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरण साधने के कई संकेत एक साथ दिखाई दे रहे हैं।




