उत्तराखंड कौथिग में जीवंत हुई गढ़वाल की लोकसंस्कृति और पौराणिक परंपराएं

-बच्छणस्यू मंडाण ग्रुप ने पांडव नृत्य और गैंडा वध का किया शानदार मंचन
-गढ़वाली रामलीला में लोकभाषा, लोकगीतों और लोकधुनों ने बांधा समां
-125 से अधिक पात्रों, 165 दृश्यों और 450 से अधिक गेय रचनाओं से सजी अनूठी प्रस्तुति
देहरादून। अखिल गढ़वाल सभा की ओर से रेंजर्स ग्राउंड में आयोजित उत्तराखंड कौथिग में गढ़वाल की समृद्ध लोकसंस्कृति, पौराणिक परंपराओं और लोकभाषा की अनूठी छटा देखने को मिली। दिन के प्रथम सत्र में बच्छणस्यू मंडाण ग्रुप रुद्रप्रयाग ने पांडव नृत्य एवं गैंडा वध का प्रभावशाली मंचन कर दर्शकों को देवभूमि की प्राचीन धार्मिक एवं अनुष्ठानिक परंपराओं से रूबरू कराया। वहीं, शाम को कुलानंद घनशाला के निर्देशन में प्रस्तुत गढ़वाली रामलीला ने लोकभाषा, लोकगीतों और पारंपरिक धुनों के माध्यम से दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
प्रथम सत्र का शुभारंभ हीरो होंडा ग्रुप के अधिकारी पंकज भट्ट और निखिल ने दीप प्रज्वलित कर किया। इसके बाद प्रस्तुत पांडव नृत्य एवं गैंडा वध लोकनाट्य में महाभारत काल से जुड़ी पौराणिक गाथा का सजीव चित्रण किया गया। मंचन में पांडवों के पिता महाराज पांडु के श्राद्ध एवं तर्पण की कथा को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया।
लोकमान्यता के अनुसार द्वापर युग में पितरों के तर्पण के लिए गैंडे की खगोटी और उसके सींग को अत्यंत पवित्र एवं सिद्ध माना जाता था। इसी मान्यता के आधार पर अर्जुन अपने पिता महाराज पांडु के तर्पण के लिए गैंडे की खोज में पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं। वहां नागार्जुन के क्षेत्र में उन्हें गैंडा मिलता है, जिसका स्वामी नागार्जुन होता है। अर्जुन द्वारा गैंडे का वध किए जाने पर नागार्जुन क्रोधित हो उठता है और दोनों के बीच भीषण युद्ध होता है। युद्ध में अर्जुन घायल हो जाते हैं। इसी दौरान नागकन्या का प्रवेश होता है, जो अर्जुन की वीरता और उनके प्रति अपने प्रेम का उल्लेख कर नागार्जुन को युद्ध रोकने के लिए प्रेरित करती है। इसके बाद अर्जुन और नागकन्या का विवाह होता है। अर्जुन वासुदंता को लेकर हस्तिनापुर पहुंचते हैं, जहां पांडव अपने पिता महाराज पांडु का श्राद्ध एवं तर्पण करते हैं। अंत में आशीर्वाद के साथ पांडव अपने लोक को प्रस्थान करते हैं। इस संपूर्ण लोकगाथा का निर्देशन अंकित रावत ने किया।
गढ़वाली रामलीला ने बांधा समां
शाम छह बजे उत्तराखंड कौथिग के मंच पर गढ़वाली रामलीला का भव्य मंचन किया गया। कुलानंद घनशाला द्वारा रचित एवं निर्देशित इस प्रस्तुति में गढ़वाल की लोकसंस्कृति, भाषा, साहित्य और पारंपरिक संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिला। गढ़वाली संवादों, लोकगीतों और चौपाइयों से सजी रामलीला ने दर्शकों को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रभावी संदेश दिया। कलाकारों के सशक्त अभिनय और मधुर लोकधुनों ने पूरे वातावरण को राममय बना दिया। कई प्रसंगों पर दर्शकों ने तालियों से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया, जबकि भावुक दृश्यों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
विशेष बात यह रही कि दस दिनों तक चलने वाली रामलीला की संपूर्ण कथा को लगभग ढाई घंटे में समेटकर प्रस्तुत किया गया। इसकी प्रभावशाली और सघन प्रस्तुति में लेखक एवं निर्देशक कुलानंद घनशाला का चार दशक का रंगमंचीय और साहित्यिक अनुभव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
घनशाला ने बताया कि गढ़वाली रामलीला में गढ़वाल की लगभग 60 पारंपरिक लोकधुनों पर आधारित गीत, दोहे और चौपाइयां शामिल की गई हैं। इसमें 450 से अधिक गेय रचनाओं, 125 से अधिक पात्रों और 165 दृश्यों को समाहित किया गया है। विशिष्ट लोकनाट्य शैली में तैयार इस रामलीला के माध्यम से गढ़वाली भाषा और लोकसंगीत के जरिए रामकथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
रामलीला का संगीत निर्देशन लोकगायक ओम बधानी ने किया। इसके गीतों को उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायकों ने अपने स्वर दिए हैं। इनमें नीता कुकरेती, रेखा धस्माना, आशा भट्ट, ओम बधानी, विवेक नौटियाल, चंद्रदत्त सुयाल, अभिनव रावत, राकेश भट्ट, ओमप्रकाश सेमवाल और गिरीश सुंदरियाल प्रमुख हैं।
मातृभाषा का संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी : रोशन धस्माना
इस अवसर पर अखिल गढ़वाल सभा के अध्यक्ष रोशन धस्माना ने कहा कि शिक्षा के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को जोड़ना बेहद आवश्यक है। मातृभाषा हमारी पहचान है और अपनी लोकभाषा एवं संस्कृति का संरक्षण करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
सभा के महासचिव गजेंद्र भंडारी ने स्वागत करते हुए कहा कि बच्चों को सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने के साथ ही अपनी मातृभाषा का ज्ञान देना भी जरूरी है। गढ़वाली जैसी लोकभाषाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में रामलीला जैसे आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सांस्कृतिक सचिव उदय शंकर भट्ट ने भी लोकभाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए ऐसे आयोजनों को प्रभावी माध्यम बताया। उपाध्यक्ष निर्मला बिष्ट ने गढ़वाली रामलीला की सराहना करते हुए इसे लोकसंस्कृति का भव्य सांस्कृतिक अनुष्ठान बताया।
उल्लेखनीय है कि सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल पिछले कई वर्षों से लोकविरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए विभिन्न सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन करता रहा है। गढ़वाली रामलीला का यह मंचन भी इसी सांस्कृतिक परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी रहा।
कार्यक्रम में सभा अध्यक्ष रोशन धस्माना, महासचिव गजेंद्र भंडारी, उपाध्यक्ष निर्मला बिष्ट, उदय शंकर भट्ट, अजय जोशी, संतोष गैरोला, वीरेंद्र असवाल और सूर्य प्रकाश भट्ट सहित देहरादून के अनेक रंगकर्मी, साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित रहे।



