एक्सक्लूसिव

एक्सक्लुसिव ख़ुलासा:जिलाधिकारी नहीं मानते शासनादेशों में जारी निर्देश आयोग में शिकायत के बाद हुआ ख़ुलासा

भूपेन्द्र कुमार लक्ष्मी

सम्पूर्ण मामला यह हैं कि जिला देहरादून के मेहूवाला क्षेत्र निवासी सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद आशिक द्वारा व्यापक जनहित में मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड में शिकायत दर्ज करवाई गई कि ओबीसी प्रमाण पत्रों के ऊपर उनकी वैधता अंकित नहीं रहती है जबकि अन्य प्रकार के प्रमाण पत्र जैसे की आय प्रमाण पत्र के ऊपर उसकी वैधता 6माह अंकित रहती है ।

जबकि इसी प्रकार ओबीसी के जाति प्रमाण पत्र की वैधता 3 वर्ष है परंतु फिर भी ओबीसी जाति प्रमाण पत्र की वैधता उसके ऊपर अंकित नहीं की जाती है ।


आयोग के सदस्य रामसिंह मीना द्वारा दिनाँक 28 फ़रवरी 2020 को मोहम्मद आशिक की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए सचिव समाज कल्याण उत्तराखंड शासन को नोटिस जारी कर इस संबंध में 4 सप्ताह में आख्या मांगी गई ।


आयोग के आदेशों पश्चात एल. फैनई सचिव उत्तराखंड शासन द्वारा दिनाँक 3जून 2020 को वाद से संबंधित अपनी आख्या भेजी गई और अपनी आख्या में अंकित किया है कि शासनादेश पश्चात दिनांक 26 फरवरी 2016 को सचिव उत्तराखंड शासन डॉक्टर भूपिन्दर कौर ओलख द्वारा उत्तराखंड के समस्त जिलाधिकारियों को जनपदों में प्रमाण पत्र जारी करने हेतु प्राधिकृत अधिकारियों को प्रमाण पत्र निर्गत करते समय प्रमाण पत्र की वैधता अवधि अनिवार्य रूप से अंकित करने के संबंध में कार्यवाही सुनिश्चित करने हेतु आदेश जारी किए गए हैं ।


परंतु दिनांक 26 फरवरी 2016 को जारी शासनादेशों को हवा में उड़ा दिया गया लगता है क्योंकि सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद आशिक द्वारा उनको जारी ओबीसी प्रमाण पत्र दिनांक 15 मार्च 2018 से लेकर 27 जुलाई 2020 तक अन्य लोगों को जारी ओबीसी प्रमाण पत्रों की प्रतियां उपलब्ध करवाई है, जिनमें स्पष्ट रूप से दर्शित हो रहा है की अभी तक भी जारी किए गए ओबीसी प्रमाण पत्रों में वैधता अवधि अंकित नहीं की जा रही है ।


परन्तु गज़ब देखिये एल. फैनई सचिव उत्तराखंड शासन द्वारा दिनाँक 3 जून 2020 को अपनी आख्या आयोग में भेजी गई है कि 26 फरवरी 2016 को उत्तराखंड के जिलाधिकारियों को ओबीसी प्रमाण पत्रों पर वैधता अंकित करने हेतु आदेश जारी किए गए हैं और दूसरी ओर 27 जुलाई 2020 को भी जारी ओबीसी प्रमाण पत्रों पर वैधता अवधि अंकित नहीं की जा रही है ।