अज्ञात मृतक का शव कूड़ा ढोने वाली गाड़ी से अस्पताल पहुंचाने का मामला
मानवाधिकार आयोग ने लिया संज्ञान: जिलाधिकारी नैनीताल को जांच के साथ आवश्यक कार्रवाई के निर्देश,13 जनवरी तक मांगी आख्या
अज्ञात मृतक का शव कूड़ा ढोने वाली गाड़ी से अस्पताल पहुंचाने का मामला
मानवाधिकार आयोग ने लिया संज्ञान: जिलाधिकारी नैनीताल को जांच के साथ आवश्यक कार्रवाई के निर्देश, 13 जनवरी तक मांगी आख्या
मीडिया में प्रकाशित समाचार पर सामाजिक कार्यकर्ता भूपेन्द्र कुमार लक्ष्मी की शिकायत का आयोग ने लिया संज्ञान; मृतक की गरिमा से जुड़े गंभीर सवाल
✍️”मृतक की पहचान भले ही अज्ञात थी, लेकिन उसकी इंसानियत और गरिमा अज्ञात नहीं थी।”
✍️”मृत्यु के बाद इंसान अज्ञात हो सकता है, लावारिस हो सकता है, लेकिन वह कूड़ा नहीं हो सकता। उसके शरीर में कभी जीवन था, उसकी भी एक कहानी थी। उसकी पहचान मिट जाने से उसकी मानवीय गरिमा समाप्त नहीं हो जाती।”
देहरादून/रामनगर। किसी इंसान की मृत्यु के बाद भी उसकी गरिमा और सम्मान समाप्त नहीं हो जाता। लेकिन उत्तराखंड के रामनगर में सामने आया एक मामला हमारी व्यवस्था की संवेदनशीलता और मानवीय जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्राम टांडा मल्लू में नेशनल हाईवे-309 पर मिले एक अज्ञात युवक के शव को कथित रूप से अस्पताल पहुंचाने के लिए कूड़ा ढोने वाली गाड़ी का इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया था। इस घटना की तस्वीरें और वीडियो भी मीडिया तथा सोशल मीडिया में प्रसारित हुए थे।
14 अगस्त को प्रकाशित समाचार के अनुसार, रामनगर में मिले अज्ञात युवक के शव को पुलिस द्वारा रामनगर संयुक्त चिकित्सालय पहुंचाने के लिए कूड़ा उठाने वाली गाड़ी का इस्तेमाल किया गया। समाचार में यह भी उल्लेख किया गया कि घटनास्थल से चिकित्सालय की दूरी लगभग पांच किलोमीटर थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सामाजिक, आरटीआई एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता भूपेन्द्र कुमार लक्ष्मी ने 17 अगस्त 2026 को उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग, देहरादून के समक्ष जनहित में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में उठाए गए थे व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल
शिकायतकर्ता ने आयोग के समक्ष सवाल उठाया था कि यदि समाचार में वर्णित तथ्य सही हैं, तो आखिर किस अधिकारी अथवा कर्मचारी के निर्णय पर अज्ञात मृतक के शव को कूड़ा ढोने वाली गाड़ी से अस्पताल पहुंचाया गया? क्या उस समय एंबुलेंस उपलब्ध नहीं थी? यदि एंबुलेंस उपलब्ध नहीं थी, तो क्या किसी अन्य सम्मानजनक वाहन की व्यवस्था नहीं की जा सकती थी?
शिकायत में यह भी मांग की गई थी कि घटना के समय के सीसीटीवी फुटेज, पुलिस जीडी/रोजनामचा, वाहन संबंधी रिकॉर्ड, पंचनामा तथा अन्य संबंधित अभिलेख सुरक्षित कराए जाएं। वायरल वीडियो और तस्वीरों की सत्यता की जांच कर संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका निर्धारित की जाए तथा लापरवाही अथवा अमानवीय व्यवहार सामने आने पर विधिसम्मत कार्रवाई की जाए।
मानवाधिकार आयोग द्वारा जिलाधिकारी को जांचोपरांत आवश्यक कार्रवाई और आख्या देने के निर्देश दिए गए हैं।
शिकायत पर उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग ने दिनांक 30 सितंबर 2026 को आदेश जारी किया।
आयोग के सदस्य हरि चंद्र सेमवाल द्वारा पारित आदेश में शिकायतकर्ता के प्रार्थना पत्र की प्रति जिलाधिकारी, नैनीताल को प्रेषित किए जाने तथा आवश्यक कार्रवाई करते हुए निर्धारित तिथि तक आख्या प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
आयोग के आदेश के अनुसार इस प्रकरण की पत्रावली दिनांक 13 जनवरी 2027 को प्रस्तुत की जानी है।
सवाल सिर्फ एक गाड़ी का नहीं, इंसानियत और व्यवस्था की सोच का है!
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी अज्ञात व्यक्ति का शव होने मात्र से उसके सम्मान और गरिमा का महत्व कम हो जाता है?
मृतक की पहचान नहीं थी, उसका कोई परिजन मौके पर मौजूद नहीं था, वह किस परिवार का सदस्य था और किन परिस्थितियों में उसकी मृत्यु हुई, यह सब उस समय अज्ञात था। लेकिन क्या इन परिस्थितियों में भी उसके शव के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी नहीं थी?
कूड़ा उठाने वाली गाड़ी का उपयोग यदि वास्तव में शव को अस्पताल पहुंचाने के लिए किया गया, तो यह केवल वाहन के चयन का मामला नहीं रह जाता। यह सरकारी व्यवस्था की मानवीय संवेदनशीलता, जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
सोचिए, जिस वाहन में शहर का कूड़ा-कचरा ढोया जाता है, उसी वाहन में किसी इंसान के शव को अस्पताल पहुंचाने की नौबत क्यों आई? क्या उस समय जिम्मेदार लोगों को यह भी महसूस नहीं हुआ कि वह किसी का शव है, कोई बेकार वस्तु नहीं?
अज्ञात होना किसी इंसान की पहचान का अभाव हो सकता है, लेकिन उसके सम्मान का अभाव नहीं।
शिकायतकर्ता की मांग: जिम्मेदारी तय हो और भविष्य में ऐसी घटना न हो
शिकायतकर्ता भूपेन्द्र कुमार लक्ष्मी का कहना है कि इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यह स्पष्ट होना चाहिए कि शव को कूड़ा वाहन से ले जाने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही अथवा अमानवीय कार्यप्रणाली सामने आती है तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी अपेक्षा जताई है कि प्रशासन ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करे कि भविष्य में किसी भी अज्ञात मृतक के शव के साथ इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति न हो।
आखिर में एक सवाल पूरे समाज और व्यवस्था से भी है,क्या इंसान को सम्मान पाने के लिए जीवित होना जरूरी है? क्या मृत्यु के बाद उसकी गरिमा की कोई कीमत नहीं रह जाती?
किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर, असहाय और बेसहारा व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। एक अज्ञात मृतक के शव के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना भी हमारी सामूहिक मानवीय जिम्मेदारी है।
अब देखना होगा कि जिलाधिकारी नैनीताल द्वारा कराई जाने वाली जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और इस गंभीर मामले में जिम्मेदारी किसकी निर्धारित होती है।




