“उत्तराखंड वन विभाग ने आरटीआई को किया नजरअंदाज
“9 जनवरी के आरटीआई कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का स्पष्ट संदेश: आरटीआई पारदर्शी शासन का आधार लापरवाही अस्वीकार्य”
उत्तराखंड:वन विभाग ने आरटीआई को किया नजरअंदाज
“9 जनवरी के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का स्पष्ट संदेश: आरटीआई पारदर्शी शासन का आधार लापरवाही अस्वीकार्य”
देहरादून:उत्तराखंड वन विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही की स्थिति एक बार फिर कटघरे में है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत दिनांक 10 दिसंबर 2025 को जनहित में मांगी गई सूचनाएं आज तक उपलब्ध नहीं करवाई गई है आरटीआई कानून की स्पष्ट रूप से खुली अवहेलना की जा रही है।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय, उत्तराखंड वन विभाग, राजपुर रोड देहरादून के लोक सूचना अधिकारी को विधिवत रूप से भेजे गए आरटीआई आवेदन में विभाग की प्रादेशिक (Territorial) वन रेंजों से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण और सार्वजनिक महत्व की जानकारियां मांगी गई थीं। इसके अंतर्गत राज्य में स्वीकृत कुल वन रेंजों की संख्या, सर्कल-वार व डिवीजन-वार विवरण, प्रत्येक रेंज के प्रभारी अधिकारियों के नाम-पदनाम, एक से अधिक रेंजों का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे अधिकारियों की सूची, पूर्णतः रिक्त रेंजों की जानकारी तथा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट एवं एसएमसी डिवीज़न जैसी प्रादेशिक संरचनाओं का विवरण शामिल था।
आरटीआई आवेदन के साथ नियमानुसार ₹10 का पोस्टल ऑर्डर भी संलग्न किया गया था, इसके बावजूद 30 दिनों की वैधानिक समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी न तो कोई सूचना दी गई और न ही किसी प्रकार का उत्तर प्रेषित किया गया।
सूचना न देने से यह आशंका और गहरी हो रही है कि वन विभाग में कई वन रेंजों के रिक्त पड़े होने,अधिकारियों पर अवैध या असंतुलित अतिरिक्त प्रभार तथा प्रशासनिक अव्यवस्थाओं को जानबूझकर सार्वजनिक होने से रोका जा रहा है।
यह मामला केवल एक आरटीआई का नहीं, बल्कि वन प्रशासन की कार्यशैली, पारदर्शिता और जनहित के प्रति संवेदनशीलता पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा भी 09 जनवरी 2026 को सचिवालय में आरटीआई अधिनियम (सूचना का अधिकार कानून) के लागू होने के 20 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित कार्यक्रम में कहा गया था कि
*सूचना का अधिकार जन सशक्तिकरण और पारदर्शी शासन का मजबूत आधार है* साथ ही आरटीआई अधिनियम के तहत सराहनीय कार्य करने वाले लोक सूचना तथा अपीलीय अधिकारियों को मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किया गया था।
अब देखना होगा कि शासन इस कानून उल्लंघन पर क्या कार्रवाई करता है या फिर आरटीआई को यूं ही फाइलों में दबाया जाता रहेगा।


