*हक़ नहीं, आदत: समाज में बढ़ती ‘बिना हक़ लेने’ की प्रवृत्ति*
*हक़ नहीं, आदत: समाज में बढ़ती ‘बिना हक़ लेने’ की प्रवृत्ति*
हम अक्सर बड़ी चोरी, घोटालों और भ्रष्टाचार की बात करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी अपने आसपास हो रही छोटी-छोटी अनैतिक आदतों पर ध्यान दिया है?
कभी फल-सब्ज़ी की ठेली पर खड़े होकर बिना पूछे अंगूर का गुच्छा तोड़ लेना, केला छीलकर खा लेना, या “चखने” के नाम पर मुट्ठी भर खाने का सामान उठाकर खा जाना — मानो ठेली वाले ने कोई उधार चुकाना हो।

क्या यह सच में मामूली बात है?
ठेली वाला व्यापारी नहीं, मेहनतकश है
जिस ठेली से हम बिना पूछे सामान उठा लेते हैं, वह किसी बड़े कारोबारी की दुकान नहीं होती।
वह एक मेहनतकश व्यक्ति की रोज़ की कमाई होती है।
सुबह मंडी से उधार पर माल लाता है
दिनभर धूप-बारिश में खड़ा रहता है
शाम को घर लेकर जाता है कुछ सौ रुपये
हमारी “एक मुट्ठी” उसके लिए नुकसान है, लेकिन आदत बन जाए तो यह नुकसान बढ़ता जाता है।
यह चोरी की श्रेणी में भले न गिनी जाए, पर यह नैतिकता की कसौटी पर जरूर खरा नहीं उतरती।
शादी-समारोह में ‘अधिकार’ की मानसिकता
एक और दृश्य आम है —
मोहल्ले में शादी या कोई फंक्शन हो तो कुछ लोग प्लेट भर-भरकर खाना अपने घर ले जाते हैं।
उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि:
अभी सब मेहमानों ने खाना खाया या नहीं
बच्चों और बुजुर्गों के लिए पर्याप्त भोजन है या नहीं
आयोजक किस मेहनत और खर्च से व्यवस्था कर रहा है
कभी-कभी तो लोग बार-बार लाइन में लगकर जरूरत से ज्यादा खाना ले लेते हैं।
यह केवल भोजन की बर्बादी नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की कमी है।
यह समस्या क्यों बढ़ रही है?
“सब करते हैं” वाली मानसिकता
शर्म का अभाव
छोटी गलतियों को अपराध न मानना
मुफ्त मिलने की आदत
धीरे-धीरे यही छोटी आदतें बड़े सामाजिक भ्रष्टाचार का आधार बनती हैं।
सवाल हम सब से
क्या बिना पूछे खाना चखना सही है?
क्या जरूरत से ज्यादा लेना हमारी संस्कृति है?
क्या हम अपने बच्चों को यही संस्कार दे रहे हैं?
भारतीय संस्कृति में “संयम” और “साझा सम्मान” सिखाया गया है।
“अतिथि देवो भव” का अर्थ यह नहीं कि अतिथि ही सब कुछ ले जाए।
समाधान क्या है?
# बच्चों को छोटी उम्र से ईमानदारी सिखाएँ#
# जरूरत भर लें, लालच न करें#
# मेहनतकश का सम्मान करें#
# सामाजिक कार्यक्रमों में संवेदनशील रहें#
निष्कर्ष
समाज बड़ी घटनाओं से नहीं, छोटी आदतों से बनता और बिगड़ता है।
यदि हम सच में भ्रष्टाचार मुक्त समाज चाहते हैं, तो शुरुआत खुद से करनी होगी —
ठेली से बिना पूछे फल न उठाकर, और समारोह में मर्यादा रखकर।
क्योंकि चरित्र वहीं दिखता है जहाँ कोई देख नहीं रहा होता।
