Specific

आदरणीय सर्वशक्तिमान ईश्वर जी के दरबार में कोई भी वीआईपी नहीं

आदरणीय सर्वशक्तिमान ईश्वर जी के दरबार में कोई भी वीआईपी नहीं!

Oplus_16908288

जब हम ईश्वर के दरबार की कल्पना करते हैं, तो वहाँ न कोई लाल बत्ती जलती है, न कोई सरकारी सुरक्षा घेरा बनता है, न कोई प्रोटोकॉल का शोरगुल होता है। वहाँ सिर्फ एक ही चीज़ है—सच्चाई। कोई मंत्री नहीं, कोई नेता नहीं, कोई अधिकारी नहीं। वहाँ सिर्फ आत्माएँ हैं, जो नंगे पैर, बिना पदवी के, बिना घमंड के खड़ी होती हैं।

फिर भी इस धरती पर हम देखते हैं कि कुछ लोग खुद को “वीआईपी” समझने की भूल कर बैठे हैं। मंत्री, नेता, पॉलिटिशियन, अधिकारी—जिनके नाम के आगे “माननीय”, “आदरणीय” लिखा होता है—वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि उनका यह “वीआईपी” दर्जा सिर्फ़ एक अस्थायी सरकारी फाइल का हिस्सा है, ईश्वर की फाइल का नहीं।

वे हवाई अड्डे पर प्राथमिकता से निकलते हैं, सड़क पर ट्रैफिक रोका जाता है, आम आदमी घंटों जाम में फँसा रहता है। उनके घर के बाहर बुलेटप्रूफ गाड़ियाँ खड़ी रहती हैं। उनकी बैठक में लोग घंटों इंतज़ार करते हैं। उनकी एक फोन कॉल से फाइलें मंजूर हो जाती हैं, उनकी एक नज़र से अधिकारियों के सिर झुक जाते हैं। घमंड उनकी श्वास बन जाता है। वे खुद को इतना बड़ा समझने लगते हैं कि लगता है मानो सृष्टि का संचालन उन्हीं के हाथ में है।

पर ईश्वर के दरबार में यह सब धूल हो जाता है।

वहाँ न कोई पासपोर्ट है, न कोई सुरक्षा कर्मी, न कोई “माननीय” का बोर्ड। वहाँ सिर्फ़ कर्मों का हिसाब होता है। वहाँ कोई “आरक्षण” नहीं, कोई “कोटा” नहीं, कोई “वीआईपी कल्चर” नहीं। वहाँ सबसे बड़ा नेता भी उतना ही साधारण है जितना कोई साधारण किसान या मजदूर। मौत के बाद जब आत्मा ईश्वर के सामने खड़ी होती है, तब न तो कोई रेड बत्ती जलती है, न कोई अधिकारी चिल्लाता है “साइड दो, साइड दो!” वहाँ सिर्फ़ एक प्रश्न होता है— “तुमने जो दिया, वह कितना था? और जो लिया, वह कितना था?”

जो आज घमंड में चूर हैं, कल उन्हें याद आएगा कि जिस कुर्सी पर वे बैठे थे, वह कुर्सी ईश्वर की नहीं थी। वह तो सिर्फ़ जनता की अस्थायी देन थी। जिस शक्ति का वे दुरुपयोग कर रहे थे, वह शक्ति भी जनता की थी, उनकी अपनी नहीं।

सच्चे संत कहते हैं— “घमंड सबसे बड़ा पाप है, क्योंकि वह इंसान को भगवान से अलग कर देता है।” आज के वीआईपी लोग भूल जाते हैं कि भगवान ने उन्हें सत्ता इसलिए नहीं दी थी कि वे आम आदमी को अपमानित करें। सत्ता दी गई थी सेवा के लिए। पर सेवा की जगह उन्होंने “स्वार्थ” और “अहंकार” को जगह दे दी।

ईश्वर के दरबार में कोई भी वीआईपी नहीं होता—यह बात जितनी सरल है, उतनी ही कठोर भी। यह उन सबके लिए चेतावनी है जो आज सत्ता के नशे में चूर हैं। एक दिन सबको खाली हाथ लौटना है। वहाँ न कोई मंत्री बचेगा, न कोई नेता, न कोई अधिकारी। सिर्फ़ एक ही चीज़ बचेगी—कर्मों का लेखा-जोखा।

जो आज घमंड में जी रहे हैं, वे कल रोएँगे।

जो आज विनम्र हैं, वे कल मुस्कुराएँगे।

ईश्वर का दरबार बहुत बड़ा है, लेकिन उसमें जगह सिर्फ़ उन लोगों के लिए है जिनके दिल में घमंड नहीं, सिर्फ़ सेवा का भाव है। बाकी सबके लिए वहाँ सिर्फ़ एक ही जगह है—सामने की कतार में, बिना किसी विशेष दर्जे के।

ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे।

Related Articles

Back to top button