एडीजे प्रथम महेश चंद्र कौशिबा की अदालत ने सुनाई तीन को फांसी और दो को उम्रकैद की सजा
ऑनलाइन ऑर्डर जैसी सुपारी से हुआ मोहसिन का कत्ल – अदालत का ऐतिहासिक फैसला”

दो वर्ष से भी कम समय में चला डे-टू-डे ट्रायल, तीन को फांसी और दो को उम्रकैद – न्यायपालिका ने न्याय की नई मिसाल दी

देहरादून:प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश महेश चंद्र कौशिवा की अदालत ने मोहसिन हत्याकांड में ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा कि “यह हत्या जोमैटो जैसी ऑनलाइन ऑर्डर प्रणाली की तर्ज पर की गई सुपारी किलिंग है, जिस पर दया दिखाना न्याय के साथ विश्वासघात होगा।”
हत्या की साजिश और तरीका
28 नवम्बर 2022 को ई-रिक्शा चालक मोहसिन को पहले मित्रता के बहाने अरशद, शाहरुख और रवि कश्यप ने रिक्शा बुक कर गुछुपानी बुलाया। वहां शराब पिलाकर उसे पत्थरों से सिर व चेहरे पर कुचलकर मौत के घाट उतार दिया गया और शव नाले में डाल दिया गया।
इस अपराध के पीछे मास्टरमाइंड साबिर अली था, जिसने अपने साढ़ू रईस ख़ान को ₹2 लाख सुपारी दी। रईस ने ऑनलाइन बैंक ट्रांजेक्शन और मोबाइल कॉल्स के जरिए बाहर से हत्यारों को बुलाकर यह “ऑर्डर” पूरा कराया। अदालत ने टिप्पणी की कि यह हत्या ऐसे की गई जैसे कोई मोबाइल ऐप पर क्लिक कर ऑर्डर करता है।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां
यह “कॉन्ट्रैक्ट किलिंग” सुनियोजित, क्रूर और अमानवीय थी।
आरोपियों ने न सिर्फ हत्या की, बल्कि गर्व से वीडियो तक रिकॉर्ड किया, जो उनकी “अत्यंत नृशंस मानसिकता” दर्शाता है।
सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन चार्ट, बैंक ट्रांजेक्शन और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) अदालत द्वारा निर्णायक साक्ष्य माने गए।
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट की मिसालों का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” श्रेणी में आता है।
फैसला
अरशद, शाहरुख और रवि कश्यप को फांसी की सज़ा।
साबिर अली और रईस ख़ान को आजीवन कारावास।
पत्नी शीबा उर्फ़ सीमा को संदेह का लाभ देकर बरी।
मृतक के सगे भाई तौकीर द्वारा रिपोर्ट दर्ज करवाई और वादी की ओर से पैरवी अरविंद कपिल अपर जिला शासकीय अधिवक्ता और विक्रम सिंह पुंडीर अधिवक्ता द्वारा की गई।
ट्रायल की विशेषता
इस मुकदमे को माननीय उच्च न्यायालय के आदेशानुसार डे-टू-डे आधार पर सुना गया। मात्र दो वर्षों के भीतर संपूर्ण साक्ष्य, गवाहों की गवाही और बहस पूरी करते हुए अदालत ने फैसला सुनाकर यह सिद्ध किया कि न्याय यदि दृढ़ निश्चय के साथ किया जाए तो वर्षों तक लंबित रहने की आवश्यकता नहीं।
न्यायपालिका की सराहना
न्यायाधीश महेश चंद्र कौशिवा की दृढ़ता, तीव्र गति और साक्ष्य-आधारित निर्णय को समाज ने न्यायपालिका की गरिमा बढ़ाने वाला करार दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला न केवल मृतक परिवार को न्याय दिलाता है बल्कि यह संदेश भी देता है कि “आधुनिक तकनीक के सहारे दी गई सुपारी भी कानून की पकड़ से नहीं बच सकती।”




