जीवन के अधिकार पर हमला: दूषित पानी पर मानवाधिकार आयोग की एंट्री
मामले को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए मुख्य सचिव,उत्तराखंड से तलब की रिपोर्ट
देहरादून:शहर में पेयजल आपूर्ति की बदहाल स्थिति अब एक गंभीर मानवाधिकार मुद्दा बन गई है। जागरूक नागरिक भूपेन्द्र कुमार लक्ष्मी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत पर एवं मानवाधिकार आयोग, उत्तराखंड ने स्वतः संज्ञान (SUO-MOTU) लेते हुए मामले को अत्यंत संवेदनशील माना है।
*#शिकायत#*
विषय: देहरादून में पेयजल आपूर्ति में गंभीर अनियमितता, अत्यधिक क्लोरीन, कठोर जल एवं फीकल कोलीफार्म युक्त दूषित पानी की आपूर्ति से नागरिकों के जीवन एवं स्वास्थ्य के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के संबंध में जनहित में तत्काल कार्रवाई हेतु।(संलग्न समाचार)
उपरोक्त विषय पर इस संवाददाता द्वारा मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड में जनहित याचिका दायर कर निवेदन किया गया कि “एक जागरूक नागरिक के रूप में देहरादून नगर में पेयजल आपूर्ति की भयावह स्थिति की ओर आयोग का ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूँ, जो स्पष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त “जीवन के अधिकार” का घोर उल्लंघन है।
तथ्य एवं पृष्ठभूमि
सामाजिक वैज्ञानिक संस्था सोसायटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एनवायरनमेंटल कंजर्वेशन साइंटिस्ट (स्पेक्स) के संस्थापक डा. बृजमोहन शर्मा द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार—
देहरादून के लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्रों में पेयजल अत्यधिक कठोर है।
कई क्षेत्रों में क्लोरीन की मात्रा मानकों से पाँच गुना अधिक पाई गई है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक एवं कैंसरकारी हो सकती है।
अनेक क्षेत्रों में क्लोरीन की मात्रा शून्य पाई गई, जिससे जीवाणु संक्रमण का खतरा बढ़ गया है।
कई इलाकों में फीकल कोलीफार्म (ई-कोलाई) की मौजूदगी पाई गई है।
स्पैक्स रिपोर्ट के अनुसार 29 क्षेत्रों में नागरिकों को बार-बार गंदे पानी की शिकायत है, जिनमें प्रमुख रूप से—
केवल विहार, सेवला खुर्द, सहस्त्रधारा रोड, ट्रांसपोर्ट नगर, बंगाली मोहल्ला, चमनपुर, ईदगाह, प्रकाशनगर, अशोक विहार, निरंजनपुर, विजय पार्क, सिरमौर मार्ग, संजय कॉलोनी, किसनपुर, कालिंदी एन्क्लेव, कालीदास रोड, दूधली, मद्रासी कॉलोनी, चुक्खुवाला, धामावाला, आर्यनगर, डीएल रोड, गोविंदगढ़, कांवली रोड आदि शामिल हैं।”
“स्पैक्स द्वारा किए गए सर्वे में देहरादून की तीन प्रमुख नदियाँ
रिस्पना, बिंदाल एवं सुसवा गंभीर जल प्रदूषण की चपेट में पाई गई हैं।”
टोटल व फीकल कॉलीफार्म हजारों MPN/100 ml तक दर्ज किए गए, जबकि CPCB मानकों के अनुसार यह शून्य होना चाहिए।
पीएच मान 4.2 से 13.0 तक पाया गया, जो मानव स्वास्थ्य एवं जलीय जीवों के लिए अत्यंत घातक है।
कारगी एवं मौथरोवाला में एसटीपी होने के बावजूद प्रदूषण कम नहीं हुआ।
दूषित जल से डायरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
हाल ही में इंदौर शहर में दूषित पानी से 16 लोगों की मृत्यु तथा दर्जनों के बीमार होने की घटना इस खतरे को और भी वास्तविक बनाती है।
यह अत्यंत चिंताजनक है कि स्पैक्स संस्था द्वारा रिपोर्ट नियमित रूप से सरकारी विभागों को सौंपी जाती है, इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही, जो आम जनता की जान से खेलने के समान है।
उत्तराखंड जल संस्थान इस पूरे मामले में प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है, क्योंकि वही नागरिकों को पेयजल की आपूर्ति करता है एवं उसका बिल वसूल करता है।
अतःआयोग से निवेदन है कि देहरादून की पेयजल आपूर्ति व्यवस्था की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच करवाने की कृपा करें।
दोषी अधिकारियों/कर्मचारियों के विरुद्ध उत्तरदायित्व तय कर दंडात्मक कार्रवाई करने की कृपा करें।
प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल शुद्ध एवं सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित करवाने की कृपा करें।
जल की गुणवत्ता की नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य करवाने की कृपा करें।
नागरिकों के जीवन व स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा हेतु आवश्यक निर्देश जारी करने की कृपा करें।
*आदेश*
शिकायतकर्ता भूपेन्द्र कुमार लक्ष्मी ने देहरादून में पेयजल आपूर्ति में गंभीर अनियमितता, अत्यधिक क्लोरीन,कठोर जल एवं फीकल कोलीफार्म युक्त दूषित पानी की आपूर्ति के संबंध में शिकायत प्रस्तुत की है।
इस संबंध में पूर्व से ही आयोग में आयोग द्वारा भी स्वत: संज्ञान *SUO-MOTU* लिया गया है,इस पत्रावली को भी उस परिवाद के साथ संलग्न कर दिया जाये।
जल संस्थान के अधीन 90,044.21 किमी पेयजल लाइनों में करीब 30 प्रतिशत ऐसी लाइनें हैं, जो 30 से 40 वर्ष पुरानी बताई गई है। अक्सर गन्दापानी आने तथा पानी में बदबू आने की शिकायत मिलती रहती है।
इन्दौर की घटना का कारण पुरानी व जर्जर पाइन लाइन से सीवेज एवं पेयजल लाइन का आपस में मिलना रहा है। उक्त घटना प्राकृतिक न होकर प्रशासनिक लापरवाही, निगरानी तंत्र की विफलता रही है। नागरिकों की शिकायतों पर समय पर कार्यवाही न होना अथवा शिकायतों की अनदेखी भी एक बडा कारण है।
उक्त घटना की पुनरावृति न हो इसके लिए पेयजल की गुणवत्ता की आपात जांच, सीवेज एवं पेयजल लाइनों की पहचान, पुराने पाइप लाइनों की जांच विशेषतया उन स्थानों में जहाँ पर सीवेज एवं पेयजल लाइन साथ-साथ में हो, मानसून में जल भराव से दूषित पानी की सप्लाई को पाइप लाइन में प्रवेश होने से रोकने, आदि का कार्य किया जाना आवश्यक है।
यह प्रकरण अत्यन्त संवेदनशील एवं गंभीर प्रकृति के साथ-साथ मानव अधिकारों के उल्लंघन का है।
आदेश की प्रति प्रकाशित समाचार की प्रति के साथ मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड शासन को प्रेषित की जाए, वह नियत तिथि तक अपनी आख्या प्रस्तुत करेंगे।
पत्रावली दिनांक 19.03.2026 को पेश हो।




